Part 1 - The Introduction

Mulaqat

Ashish comes out to Divya about his unique hobby. She insists on seeing him all decked up in person and books the tickets. As the moment of reckoning nears, Ashish gets anxious about what is going to happen next

  • Pankhuri
  • 2 years, 4 months ago
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वो लगातार बैठक में टहल रही थी। गला भी थोड़ा सा खुश्क हो चला था। और दिल मानो रेल की रफ्तार से धडक रहा था। बैठक में और कोई आवाज़ नहीं आ रही थी; बस उसके पदचाप, घड़ी में कच्च-कच्च से सेकंड के कांटे का चलने का संकेत और शायद उसका दिल जो मानो सीने से बाहर आने वाला हो। सोचने लगी की क्या कर रही है, और क्या ज़रूरत थी दिव्या को ये सब बताने की। बार-बार वो दरवाजे के छेद से देख रही थी की दिव्या आई की नहीं। उसको मानो काटो तो खून नहीं।


कमरे में चहलकदमी कर रही लड़की का नाम असल में आशीष था। लेकिन इस समय कोई उसे देख ले तो कोई बोल नहीं सकता था की वो आशीष है। सब उसको आशा ही समझते।


आशीष और दिव्या दोनों कॉलेज के दोस्त थे। पढ़ाई के बाद आशीष बैंग्लोर आ गया जॉब करने और दिव्या को मिला मुंबई। लेकिन टेक्नालजी के जमाने में दोनों की दोस्ती बनी रही। वीकेंड पर तो उनका विडियो कॉल चलता ही रेहता था। 13 दिन पहले आशीष आराम से पसर कर विडियो कॉल पर बात कर रहा था। चूंकि वीकेंड था तो उसने चाइनिज ऑर्डर कर लिया था। उधर दिव्या अपने लिए पराठे बना रही थी।


आशीष ने पूछा, “और बता, कैसी चल रही है तेरी घिसाई?”

“अरे यार तुझे तो पता ही है की मुंबई मिलना मतलब सब बड़े लोग के साथ उठना-बैठना। और टाइम पर जाना तो क्राइम हो मानो।”
“मैंने तो बोला ही था की मत जा उधर। लेकिन तुझे ही कैरियर बनाना था।”
“तो क्या करती मैं बोल? इसके अलावा बस दिल्ली मिल रही थी। और मुझे नहीं रहना घर पर। हो गया मेरा यार। 25 साल रेह ली। अब थोड़ा इंडिपेंडेंट भी रहना है।”
“बात तो सही है तेरी...”

मेरी छोड़... मेरा तो चलता ही रेहता है। तू बता तेरा कैसा चल रहा काम-वाम? घर मिल गया ठीक-ठाक?”
“हाँ यार...1बी-एच-के मिल गया है। थोड़ा सा महंगा है। लेकिन सोसाइटी में है तो बाकी किसी चीज़ की तकलीफ नहीं है। और मकान मालिक भी अच्छी ही हैं।”
इसके बाद दोनों ने कुछ समय तक कुछ नहीं बोला। आशीष के बस कांटा-चम्मच की आवाज़ आ रही थी और उधर दिव्या के पराठे पलटने के।
“और बता...”, दिव्या बोलती है।
“क्या बताऊँ? तेरे पराठे सिंक गए?”
“बस ये लास्ट है... कुछ भी बोल यार। मेरे तरफ से तो कुछ नहीं है बोलने को। वही ऑफिस जाओ, घर आओ, खाना खाओ, सो जाओ।”

“हम्म...”
“एक मिनट देना...”
दिव्या आखिरी पराठा अपने प्लेट पे डालती है, दूसरे हाथ में अपना आई-पैड लेकर बेडरूम के तरफ चलती है।
“बोल अब...”
उधर से आशीष कुछ नहीं बोलता है। उसके चेहरे पर उधेड़बुन साफ झलक रही थी।
“इतना सोच क्या रहा है... बोल दे कुछ भी... ऑफिस का ही बोल दे या आज क्या किया वो बोल दे।”
“यार कुछ बोलना तो था ही लेकिन सोच रहा हूँ की तू कैसे लेगी इस बात को।”
“तू बिंदास बोल यार...घर पे कोई पंगा हो या बंदी का चक्कर, डोंट वरी, मैं हूँ ना।”
आशीष अभी भी मानो खुद से सवाल कर रहा था की बोले की ना।
“यार, आई एम अ क्रॉसड्रेसर।”

ये बोल कर आशीष एकदम चुप हो जाता है। वो कुछ पल में जो हवा में टेंशन तैर रही थी, वो और गहराती जा रही थी। दिव्या ने जो निवाला निकाला था वो मुंह के सामने रुक जाता है। वो उस कौर को प्लेट में वापस रख कर प्लेट साइड में कर देती है।


“ओ बेटे! यार तुम तो छुपे रुस्तम निकले। बताया भी नहीं आज तक।”
“दिव्या, यार...तुम...”
“दोस्त तुम फालतू इतना सोच रहे थे। और मैं खुश हूँ की तुमने मुझे ये बात बताई।”
“मतलब यू आर ओके विथ दिस, ना?”
“मेरे ओके होने ना होने से क्या फर्क पड़ता है। तू ओके है तो काफी है ये। और हाँ, मैं ‘ओके’ हूँ।”
“थैंक्स!”
“ऑ....तुम बता सकते हो...सकती हो...पहले क्लियर कर की कैसे बोलूँ: सकता या सकती?”
“दोनों चलेगा...लेकिन सकती बेटर है।”
“ओके कूल। बताओगी की कब से कर रही हो? क्या अच्छा लगता है? और किसको पता है?”
“और किसी को नहीं पता। कुछ लोग हैं जिनसे ऑनलाइन चैट करती हूँ। लेकिन ऐसे रियल लाइफ में तू पहली है।”
“वाउ...”
“अच्छा तो ऑफ कोर्स सब कुछ ही लगता है। शायद हमलोग को करने नहीं मिलता तो उसकी लालसा ज़्यादा ही होती है।”
“ऑफ कोर्स.... अब हम ही को जीन्स शर्ट सब पहनने मिलता है तो कोई मोल नहीं है। लेकिन देखो जो कभी कभी हासिल हो जैसे लहंगा या ड्रेस, तो उसको पहनने में टाइम लेते हैं हम लोग भी।”

“हाँ... हमको तो सब अच्छा लगता है...बस टाइम थोड़ा ज़्यादा लगता है। पैंट शर्ट जैसा नहीं की डाला और निकल लिए। उसके बार मेक उप....उसमे अलग समय। बहुत धैर्य लगता है यार।”


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